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Prabhat Vishes

  • May 23 2016 6:09PM

दो माह में बच्चे पहचान गये हिंदी-अंगरेजी के अक्षर

दो माह में बच्चे पहचान गये हिंदी-अंगरेजी के अक्षर

।। श्रीश चौधरी ।।

बिहार के एक ग्रामीण इलाके में आइआइटी मद्रास की प्रशासनिक सहायता और तमिलनाडु न्यूजप्रिंट्स एंड प्रोडक्ट्स लिमिटेड की वित्तीय सहायता से पिण्डा रूच(दरभंगा) के प्राथमिक विद्यालयों में बच्चों को हिंदी-अंगरेजी पढ़ना सिखाने का एक अभिनव प्रयोग चल रहा है. ये वे बच्चे हैं, जिनके माता-पिता निरक्षर और गरीब हैं. ज्यादातर बच्चे अत्यंत दलित एवं पिछड़े परिवारों के हैं. पढ़िए पहली कड़ी.

पिछले अप्रैल में पिण्डारूच (पश्चिम) गांव में एक अनोखा सांस्कृति क कार्यक्रम हुआ. गांव के ही प्राथमिक कन्या पाठशाला की छात्राओं ने तथा बुनि यादी प्राथमिक विद्यालय के छात्रों ने एक साथ मिल कर डेढ़ घंटे का एक नृत्य-गीत- भजन-अभिनय कविता पाठ का रंगारंग कार्यक्रम प्रस्तुत किया. अनोखी बात यहां यह थी कि इन स्कूलों के 90 % बच्चे अत्यंत दलित एवं पिछड़े परिवारों से आते हैं. और ऐसा कुछ यहां पहले कभी नहीं हुआ था.

सभी परिवारों में माताएं निरक्षर हैं तथा घास काटने तथा पशुपालन एवं खेती से संबंधित अन्य काम करती हैं. अनेक पिता भी निरक्षर हैं या मुश्किल से साक्षर हैं तथा दैनिक मजदूरी जैसा काम करते हैं. सामान्यतया इनसे अधिक गरीब परिवारों की कल्पना करना कठिन है. इनके घरों में छपे अक्षरों का कोई कागज नहीं है. बैठ कर पढ़ने को कुरसी और मेज या एक अलग लालटेन या डिबिया भी नहीं है. अनेक बच्चे चारपाई एवं गद्दों पर नहीं सोते हैं. वे फर्श या चटाई पर मां या दादी के पास अन्य सगे भाई बहनों के साथ सामान्यतया एक कमरे के घरों में सोते हैं. किसी ने इन बच्चों को आजतक कभी भी एक कहानी नहीं सुनायी है, न ही कभी जन्मदिन या त्यौहारों में इन्हें कहानी-कविता की एक कि ताब उपहार स्वरूप दी है. 

सामान्यतया इनके घरों में कामभर शब्दों का उपयोग होता है और कुछ नहीं. स्कूल की किसी कक्षा के पाठयक्रम की एक किताब में आधी-रात को सपने में आती एक परी की कथा है. परंतु इन बच्चों को ‘सपना’ एवं ‘परी’ जैसे शब्दों का अर्थ नहीं

पता है. अंगरेजी के Elephant को हिंदी में हाथी एवं Camel को ऊंट कहते हैं, यह इन्हें पता है. पर, इन पशुओं को इन्होंने देखा नहीं है. Orange को ‘समतोला’ कहते हैं. कुछ बच्चों ने खाया हुआ है, ‘पापा लाया था’ ‘मीठा होता है’. ‘खेत में होता है’ आदि. कई बच्चे Orange मने आम भी कहते हैं. पहली या दूसरी कक्षा की अंगरेजी की

किताब में ‘इंद्रधनुष’ पर एक पाठ है. “तुमने इंद्रधनुष देखा है’- मैंने एक बच्चे से पूछा. “जी” -उसने कहा. “कहां?”- वह चुप रहा. “आकाश में या जमीन पर”- मैंने फिर पूछा. “दोनो”! “कभी-कभी आकाश में और कभी-कभी जमीन पर!”

- बच्चे ने कहा.

एक और किताब में सुदामा-कृष्ण की कहानी है. पर ये बच्चे नहीं जानते हैं, सुदामा कौन थे और कृष्ण कौन थे. किसी ने उनसे अभीतक ये कहानियां नहीं कहीं है. उपरोक्त बच्चे की मां भी कृष्ण की कहानी नहीं जानती है. उसके पिता लेकिन राम की कहानी जानते हैं. राम के दो भाई थे. एक साथ जंगल गये. और, दूसरे ने राम को जंगल भेजा. इनके अनुसार राम की दो माताएं थीं - एक ने जन्म दिया और दूसरे ने जंगल भेजा. हमारी अधिकांश पाठय पुस्तकें शहरी एवं शिक्षित परिवारों के बच्चों के लिए लिखी गयी हैं. पार्को और संग्रहालयों की चर्चा है. खेतों, झोपड़ियों, बगीचों, आम, अमरूद, कौआ एवं अन्य चिड़ियों की चर्चा नहीं है या कम है. जब भाषा एवं भाषा में निहित संसार दोनों अपरिचित हैं तो सीखना अधिक कठिन हो जाता है. स्कूल में शिक्षक एवं सुविधा का अभाव भी इस स्थिति को और कठिन बना देते हैं. 

अब सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से आठवीं कक्षा तक के बच्चों की प्रोन्नति अगली कक्षा में वर्ष के अंत में स्वत: हो जाती है. उन्हें वार्षिक परीक्षा भी पास नहीं करनी है. सीखने के लिए कोई दबाब ही नहीं है. न कोई आवश्यकता. परिणामत: हमने पाया कि पांचवीं कक्षा में भी कई ऐसे बच्चे थे, जो हिंदी एवं अंगरेजी वर्णमाला के अक्षरों को भी नहीं पहचान पा रहे थे. अक्षरों को जोड़कर शब्द एवं शब्दों को जोड़कर वाक्य बनाने एवं उसे समझने की क्षमता तो 10 प्रतिशत से भी कम बच्चों में थी. कुछ कम या ज्यादा ऐसी स्थिति देश के कुछ अन्य भागों के सरकारी स्कूलों में भी है, परंतु बिहार के ग्रामीण क्षेत्र में यह जितनी गंभीर समस्या है, उतनी यह प्राय: अन्यत्र कहीं भी नहीं है.

इसी स्थिति को ध्यान में रखते हुए Tamilnadu Newsprints and Products Limited(TNPL) की वित्तीय सहायता एवं IIT Madras की प्रशासनिक सहायता से पिण्डा रूच के इन स्कलों में हिंदी-अंगरेजी पढ़ना सिखाने की एक परियोजना जनवरी, 2016 से शुरू की गयी है. इसी प्रकार से चेन्नई में अंगरेजी एवं तमिल पढ़ाने की योजना शुरू की गयी है. अगले तीन वर्षो तक सामाजिक दायित्व (Corporate Social Responsibility) अधिनियम के अंतर्गत IIT Madras के माध्यम से TNPL 15 लाख रुपये प्रति वर्ष देगा. यह परियोजना मूलत: इस धारणा पर आधारित है कि अच्छे एवं उत्साहवर्ध क परिवेश में अच्छी पुस्तकों एवं अन्य शिक्षण सामग्री के उपयोग एवं छोटे परंतु नियमित कक्षाओं में नियमित शिक्षक से बच्चे जल्दी ही पढ़ना सीख जायेंगे.

इन्ही धारणाओं के साथ सर्व शिक्षा अभियान के दरभंगा जिला पदाधिकारी रजनीकांत प्रवीण की अनुमति से इन स्कूलों में हिंदी-अंगरेजी पढ़ाने की योजना पिछले जनवरी महीने में शुरू की गयी. स्कूल की कार्यावधि के दौरान ही नित्य अंतिम दो घंटे मध्याह्न भोजन के बाद इस विशेष कक्षा के लिए निर्धारित किये गये हैं. ये विशेष कक्षाएं पिण्डा रूच गांव के ही शिक्षित एवं शिक्षा प्राप्त कर रहे युवक-युवतियों की सहायता से चला यी जा रही है. ये युवक-युवती इस परियोजना के स्वयंसेवक हैं एवं एक घोषित एवं स्तरीय जांच प्रक्रिया के माध्यम से चुने गये हैं. इन्हें बारह घंटे का एक प्रशिक्षण भी दिया गया है, जिसमें इन स्वयंसेवक शिक्षकों का ध्यान हिंदी-अंगरेजी पढ़ना सीखने की विशेष कठिनाइयों की ओर खींचा गया है. 

जो काम हिंदी में मात्राओं की सहायता से होता है, वही काम अंगरेजी में छोटे-बड़े अक्षरों के विशेष आयोजन से होता है. किसी भी भाषा के अक्षर खड़ी एवं पड़ी लकीरों एवं वृत्त के भिन्न अंगों एवं प्रकारों को ही मिलाकर बने हैं. अत: हम जब पढ़ना सिखाते हैं तो वस्तुत: हम बच्चों को आकृति पहचानना अन्य आकृतियों से उनका संयोग करना तथा फिर उनसे शब्द एवं वाक्य बनाना सिखाते हैं. इन वाक्यों का अर्थ फिर सीखने वाले के सांसारिक ज्ञान के अनुरूप होता है. इस बिंदु पर आकर इस परियोजना के माध्यम से ऐसा लगा है कि अक्षर एवं अनुच्छेद का ज्ञान कराना जितना आसान है. प्राय: सांसारिक ज्ञान उत्पन्न करना उतना आसान नहीं है. 

पिछले दो महीनों मे इन स्कूलों के प्राय: सारे बच्चे हिंदी एवं अंगरेजी के अक्षर पहचानना सीख गये हैं. उनसे ये शब्द भी बना लेते हैं. परंतु इन शब्दों का अर्थ उन्हें पता नहीं है. “Jack and Jill/ went up the hill” ये पढ़ लेते हैं, किंतु Went एवं Hill का अर्थ इन्हें नहीं मालूम है. परंतु जितने कम समय में जितनी प्रगति हुई है, वह अपेक्षा से कहीं अधिक है. इन क्लासों की एकरसता नीरसता तोड़ने के लिए अनेक प्रकार के प्रयास किये गये हैं. स्कूली पाठ्यपुस्तक के अतिरिक्त कहानियों-कविताओं वाली बच्चों के लिए उपयुक्त किताबें भी लायी गयी हैं. कुछ किताबें एवं उनकी एकाधिक प्रतियां TNPL से मिले पैसों से खरीदी गयीं हैं, परंतु हिंदी-अंगरेजी की अन्य अनेक किताबें बुकशेल्फ के साथ पांचजन्य पब्लिक चैरिटेबुल ट्रस्ट (रजि) चेन्नई के सौजन्य से उपहार स्वरूप आयी हैं. 

गांव से बाहर रह रहे यहां के कुछ परिवारों ने भी अपनी तथा अपने पड़ोसियों के बच्चों की किताबें इस परियोजना में दान दी हैं. स्वयंसेवी शिक्षक इन पुस्तकों को नित्य अपनी कक्षाओं में ले जाते हैं एवं बच्चों के साथ मिल कर पढ़ते-खेलते हैं. भय था कि बच्चे इन्हें नहीं पढ़ेंगे, इन्हें फाड़ देंगे. परंतु ऐसा नहीं हुआ. अब यह भी सोचा जा रहा है कि बच्चों को इन किताबों में से पसंद की दो एक किताबें घर ले जाने की अनुमति दी जाये. स्कूल में प्राय: नृत्य- गीत संगीत एवं शब्दों से खेल जैसा काम होता है. (जारी)

(लेखक भूपू प्रोफेसर, आइआइटी, मद्रास एवं विशिष्ट प्रोफेसर, जीएलए विवि, मथुरा हैं)

इमेल: shreeshcahudhary@gmail.com

 

 

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