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Prabhat Vishes

  • Jul 30 2016 12:33AM

आदिवासियों की जमीन लूटनेवालों के पेट में दर्द

आदिवासियों की जमीन लूटनेवालों के पेट में दर्द

झारखंड के संतुलित और समुचित विकास पर अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला शुरू, बोले सीएम

प्रभात खबर, सिदो-कान्हू मुरमू विश्वविद्यालय और रांची विश्वविद्यालय कर रहे हैं सहयोग
 
रांची  : मुख्यमंत्री रघुवर दास ने कहा है कि कुछ राजनीतिक पार्टियां वोट बैंक के लिए काम कर रही हैं. वे लोग यहां का विकास नहीं चाहते हैं. उनको झारखंड के विकास के लिए सोच बदलने की जरूरत है. यहां के लोग विकास चाहते हैं, लेकिन राजनीतिक दल नहीं चाह रहे हैं. वैसे लोग आदिवासी हितों की बात कहते हैं. जिन्होंने इस राज्य में आदिवासियों की जमीन लूटी है, आज उनके पेट में दर्द हो रहा है. मुख्यमंत्री शुक्रवार को कांके स्थित विश्वा सभागार में इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन डेवलपमेंट द्वारा झारखंड के समावेशी व टिकाऊ विकास पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला में बोल रहे थे.
 
मुख्यमंत्री ने कहा कि ऐसे लोग सरकार को परेशान कर रहे हैं. सरकार राज्य को शिक्षित प्रदेश बनाना चाहती है. यहां के आदिवासियों के चेहरे पर मुस्कान चाहती है. इसके लिए सीएनटी-एसपीटी एक्ट में कुछ सुधार करना चाहती है. इसके तहत आदिवासियों की सहमति से विकास कार्यों के लिए उनकी जमीन ली जायेगी.
 
उनको जमीन की चार गुणी कीमत मिलेगी. आधारभूत संरचना बढ़ेगा. लोग इसे रोकना चाहते हैं. वर्तमान सरकार ने आदिवासियों की जमीन की हो रही लूट को रोकने के लिए एसएआर कोर्ट समाप्त कर दिया. इससे ऐसे लोगों को परेशानी हो रही है. जो लोग जल जंगल जमीन की बात कहते हैं, वे इसे बचाना नहीं चाहते हैं. लेकिन, हमें झारखंड के भविष्य को बचाना है. 
 
 मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्तमान सरकार ने कृषि पर फोकस किया है. गांव-गांव में जाकर योजना बनायी है. बरसात का पानी रोकने के लिए तीन माह में 1.67 लाख डोभा का निर्माण कराया गया है. एक हजार तालाबों का जीर्णोद्धार किया गया है. चालू वित्तीय वर्ष में करीब चार लाख डोभा का निर्माण होगा. सरकार चाहती है कि यहां के किसान बहुफसली खेती करें. इससे पलायन रुकेगा.
 
  सरकार यहां की महिलाओं को समृद्ध करना चाह रही है. इसके लिए व्यापक योजना बनायी गयी है. इस बार ठंड में झारक्राफ्ट से तैयार कंबल का वितरण होगा. कंबल निर्माण में झारक्राफ्ट से जुड़ी महिलाओं को लगाया गया है. इनके द्वारा तैयार चादर, तकिया की आपूर्ति स्वास्थ्य विभाग के अस्पतालों में होगी. पंचायत की महिला समूहों को क्षेत्र में पड़नेवाले स्कूली बच्चों के ड्रेस का निर्माण का जिम्मा दिया जायेगा. स्कूलों में उपयोग होनेवाले फर्नीचर का निर्माण भी स्थानीय कारपेंटर ही करेंगे. इससे सरकार को करीब 400 करोड़ रुपये की बचत होगी. सरकार चाहती है कि गरीबी समाप्त हो. इसके लिए काम हो रहा है. लेकिन, कुछ राजनीतिक दल इसका विरोध कर रहे हैं.
 
इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन डेवलपमेंट (आइएचडी), इस्टर्न रीजनल सेंटर राजधानी के कांके स्थित  विश्वा सभागार में झारखंड के स्थायी और समावेशी विकास विषय पर तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार शुभारंभ शुक्रवार को हुआ. इस आयोजन में सिदो-कान्हू मुरमू विश्वविद्यालय, रांची विश्वविद्यालय और प्रभात खबर सहयोग कर रहा है. इसमें देश-विदेश के कई अर्थशास्त्री, ब्यूरोक्रेट, शिक्षाविद, राजनेता, समाजशास्री हिस्सा लेंगे.
 
तीन दिनों तक झारखंड के विकास की रूपरेखा पर मंथन होगा. पहले दिन मुख्यमंत्री रघुवर दास ने इसका उदघाटन किया. विषय प्रवेश आइएचडी के निदेशक प्रो अखल नारायण शर्मा ने किया. सिदो-कान्हू मुरमू विवि के कुलपति प्रो कमर अहसन, आइएलओ के दक्षिण एशिया के वरीय रोजगार विशेषज्ञ डॉ नुमान मजीद ने भी विचार रखे. 
 
झारखंड को समृद्ध राज्य बनाने का हो रहा है प्रयास
विकास की दौड़ में काफी पीछे : शर्मा
 
इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन डेवलमेंट (आइएचडी), नई दिल्ली के निदेशक प्रो अलख नारायण शर्मा ने कहा कि झारखंड विकास के दौड़ में अभी काफी पीछे है. आंकड़े बताते हैं कि अगर झारखंड को 2030 तक देश के साथ विकास में आकर खड़ा होना है, तो 10.21 फीसदी की दर से विकास करना होगा. यह तभी संभव है, जब भारत का विकास दर सात फीसदी के आसपास हो. झारखंड में शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति बहुत खराब है. ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के साधन विकसित करने होंगे. आबादी नियंत्रित करना होगा. 
जनजातीय समाज आजीविका को लेकर असुरक्षित : डॉ हरिश्वर दयाल
 
इंस्टीट्यूट  ऑफ ह्यूमन डेवलपमेंट के पूर्वी क्षेत्रीय सेंटर के डॉ हरिश्वर दयाल ने कहा  है कि जनजातीय आबादी अपनी आजीविका को लेकर अपने को असुरक्षित महसूस करती  है. उन्होंने कहा कि 67.4 फीसदी जनजातीय आबादी आज कर गैर कृषि दैनिक भोगी  मजदूर के रूप में कार्यरत हैं. राजधानी में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन  को संबोधित करते हुए डॉ दयाल ने कहा कि ऐसा आंकड़ा पांच जिलों के 16 गावों  में हुए सर्वेक्षण में सामने आया है.
 
उन्होंने कहा कि पलामू, साहिबगंज,  पश्चिमी सिंहभूम और लोहरदगा जिले में यह सर्वेक्षण किया गया था. उन्होंने  कहा कि इन जिलों में 33.72 फीसदी जनजातीय लोग कर्ज लेकर आजीविका चलाते हैं.  यह स्वास्थ्य और जीवन चलाने को लेकर लिया जा रहा है. इसमें ब्याज का दर भी  अलग-अलग है,
 
कोई मजदूरी कर उसकी भरपाई करते हैं, तो कोई 100 फीसदी तक  भुगतान करते हैं. उन्होंने कहा कि जनजातीय आबादी अब वन की कमी से वनोत्पाद  और अन्य का संग्रहण कम करने लगे हैं. उनके द्वारा उत्पादित सब्जियों और  अन्य कृषि उत्पादों के लिए बेहतर मंडी नहीं है. जनजातीय आबादी में जमीन के  पट्टे का समय से निबटारा नहीं होने से भी परेशानी हो रही है.  
 
क्षेत्रीय असंतुलन है राज्य में : बलवंत 
आइएचडी के बलवंत मेहता ने कहा कि झारखंड में क्षेत्रीय असंतुलन की स्थिति है. इस कारण वहां रहने वाले लोगों में काफी विषमता है. कुछ जिलों में अधिक विकास है तो कुछ पिछड़े हुए हैं.
 
पिछड़े जिलों में संताल परगना और  पलामू प्रमंडल के कुछ जिले प्रमुख हैं. यहां कारण है कि इन जिलों में दैनिक मजदूरी करने वाले लोगों के मानदेय में भी अंतर है. रामगढ़-हजारीबाग में काम करने वाले दैनिक मजदूरों को 197 तो सरायकेला में काम करने वालों को मात्र 73 रुपये मिलते हैं. इस कारण जिलों में प्रति व्यक्ति आय में भी काफी अंतर है. 
 
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