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Prabhat Vishes

  • Jun 17 2015 6:32AM

अध्यादेश का भी सम्मान नहीं कर रही सरकार

वासवी किड़ो
अभी अभी हमलोगों ने बिरसा मुंडा का शहादत दिवस मनाया. बिरसा ने अपनी बैठकों में कहा था कि ‘हमारी जमीन वैसी ही उड़ी जा रही है जैसे कि आंधी में धूल उड़ जाती है.’ एचइसी को पुरखों ने जमीन दी थी. 55 सालों बाद भी उस आदिवासी जमीन की बंदरबांट बंद नहीं हो रही है. धूल के समान जमीन उड़ा ली जा रही है.
 
आदिवासियों और मूलवासियों द्वारा एचइसी को दी गयी भूमि अब रातोंरात सरकारी जमीन बना दी गयी. वह भी तमाम संवैधानिक प्रावधानों को ताक पर रख कर. सवाल है कि कौन करेगा इंसाफ.  बहुमतवाली सरकार बेखौफ हो गयी है. अपने ही बनाये कानून का धत्ता बता कर आदिवासी जमीन को सरकारी जमीन बना दिया गया. एचइसी ने नियम को ताक पर रख कर 2555.79 एकड़ भूमि  3 मार्च 2015 को झारखंड सरकार को हस्तांतरित कर दी.
 
इस हस्तांतरण में 2013 के नये भूमि अधिग्रहण कानून का कोई ख्याल नहीं रखा गया,  न ही दूसरी बार लाये गये अध्यादेश का. 2013 के कानून की धारा 24 के 2 के मुताबिक पांच साल या उससे अधिक सालों तक एचइसी द्वारा पोजेशन यानी दखल कब्जा नहीं किये जाने पर एचइसी द्वारा किया गया अधिग्रहण स्वत: ही रद्द हो गया.
 
इसी धारा में सरकार के लिए अवसर प्रदान करते हुए यह प्रावधान किया गया है कि सरकार अगर चाहे तो उसी भूमि का पुन: नये सिरे से अधिग्रहण कर सकती है. लेकिन  इस कानून की अनदेखी करते हुए सरकार ने रैयतों के बजाय एचइसी से भूमि लेने का गैरकानूनी काम किया. इससे लगता है कि रघुवर दास की सरकार कानून नहीं मानती. केंद्र सरकार द्वारा जारी अध्यादेश भी  रैयतों के पक्ष में है, लेकिन इसका भी पालन नहीं किया गया.
 
अगर कानून नहीं मानना है तो  सरकार आदिवासियों को ऐसे ही खदेड़ कर जमीन हथिया सकती है.  अमित शाह ने रांची में कहा था कि एक इंच भी आदिवासियों की जमीन नहीं ली जायेगी. सरकार बताये कि आदिवासियों ने जो जमीन एचइसी को दी थी, वह सरकार की कैसे हो गयी? रांची भी पांचवी अनुसूची के अंतर्गत आता है.  पांचवीं अनुसूची के मुताबिक आदिवासियों की भूमि अधिग्रहित करने के पूर्व ग्राम सभा से सहमति लेना आवश्यक है.
 
लेकिन इस मामले में ऐसा करने की जरूरत भी नहीं समझी गयी. पांचवीं अनुसूची भारतीय संविधान का अंग है और आदिवासियों को इसके तहत मिला संवैधानिक अधिकार का पालन भी इस संदर्भ में नहीं किया जा रहा है. जनजातीय परामर्शदातृ समिति की बैठक 2015 में हुई लेकिन इस बैठक में भी रघुवर सरकार ने इस मसले पर विचार-विमर्श नहीं किया. इसका मतलब यह है कि सरकार  दिखावे के लिए जनजातीय परामर्शदातृ समिति की बैठक बुलाती है. तात्कालिक जरूरत के मसले पर सरकार विमर्श नहीं करा रही है.  
 
गतवर्ष 20 जनवरी को तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के साथ विस्थापितों की वार्ता में उनके लिए अच्छा पैकेज देने का वादा किया गया था और कहा था कि विश्वास की नींव पर ही विधानसभा बनेगी. लेकिन पैकेज के लिए वार्ता बंद कर दी गयी और अफरा-तफरी में विधानसभा के शिलान्यास का कार्य प्रारंभ कर दिया जा रहा है. 
 
सरकार ने पैकेज की घोषणा नहीं की है. अध्यादेश आने से कोई भी जमीन किसी काम के लिए ली जायेगी, इस बात का हौवा फैला कर सत्ताधारी दल ने गलत संदेश दिया है. अध्यादेश में केवल नौ संशोधन और कुछ नयी बातें जोड़ी गयी हैं. अध्यादेश एचइसी के संदर्भ में किसानों के पक्ष में है.  आदिवासी नौजवानों ने झारखंड उच्च न्यायालय में जमीन वापसी का केस किया है. सरकार को नोटिस दिया गया है. सरकार पहले नोटिस का जवाब दे, तब तक निर्माण कार्य रोक दें.
 
(लेखिका राज्य महिला आयोग की पूर्व सदस्य हैं.)
 
विकास के लिए बड़े मन व सोच की जरूरत
 
संजय सेठ
 
हम कहां पीछे छूट गये. आत्म मंथन करना होगा. राज्य गठन के 15 साल बाद कार्य संस्कृति बदलाव की ओर है. हमें ऐसी सरकार मिली है, जो एक ही एजेंडे पर काम कर रही है, वह है विकास. 
 
यह हमारे लिये दुर्भाग्य की बात है कि किराये के भवन में लोकतंत्र का मंदिर और सचिवालय चल रहा है. हमें हिंदुस्तान और दुनिया में संदेश देना होगा कि झारखंड बदलाव की ओर है. यहां भी तरक्की और विकास की राहें खुल चुकी हैं. विकास की राजनीति में बाधक बनना छोटी मानसिकता का परिचायक है. यह वर्तमान परिपेक्ष्य में सही नहीं है. 
 
क्योंकि दुनिया बदल चुकी है. हम पीछे छूट रहे हैं. मुख्यमंत्री रघुवर दास ने दो बार रैयतदारों के साथ बैठक की. जो लोग विरोध कर रहे थे, उनसे मिलने खेतों की पगडंडियों पर चल कर पहुंचे. उनसे वार्ता और विनती की. यह सकारात्मक संकेत हैं. बैठक में सकारात्मक बातें आयी हैं. मुख्यमंत्री ने कहा है कि रैयतों का वाजिब हक मिलेगा. उनको भी मकान, अच्छी सड़कें और पार्क मिलेंगे. उनके जीवन स्तर उठाने का काम होगा. सरकार झुग्गी-झोपड़ी में रहने वालों को दो कमरे का फ्लैट देगी. इस संबंध में पहले की सरकार की ओर से रास्ता ही नहीं खोला गया था.
 
पहले की सरकार के अंग रहे लोग अब आंदोलन और विरोध की बात कर रहे हैं. क्या वे जवाब देंगे कि जब वे सरकार में थे तो क्यों नहीं निर्णय लिया? मुख्यमंत्री ने स्वयं बातचीत की पहल की है. यह बड़ा मन और बड़े बदलाव के संकेत हैं. जो लोग विरोध कर रहे हैं, उन्हें विकास की खातिर हठ का रास्ता छोड़ना होगा. यहां पर विधानसभा, सचिवालय और हाइकोर्ट बनने से रैयतों का जीवन स्तर ऊंचा होगा. रोजगार के अवसर मिलेंगे. वहां के निवासियों को नौकरी मिलेगी. वहीं दूसरी तरफ नयी रांची का निर्माण होगा. राजधानी का फैलाव होगा. शहर से ट्रैफिक का बोझ कम होगा. अब राज्य व्यस्क हो चुका है. 
 
ऐसा में हमारा चाल, चरित्र और चेहरा व्यस्क होना चाहिए. सरकार और रैयत दोनों ओर से सकारात्मक पहल हो चुकी है. यह शुभ संकेत है. विकास की राह में रुकावट डालने वाले को जनता पहचान चुकी है. उनसे हाथ जोड़ कर विनती है कि झारखंड के विकास के लिए बड़ा मन और सोच करें.
 
ऐसा कर ही हम झारखंड की अच्छी छवि का निर्माण कर सकते हैं. यह संकेत जब देश और दुनिया में जायेगा, तो हमारे बच्चे बेंगलुरु और पुणो पढ़ने नहीं जायेंगे. ईमानदार और मेहनतकश मजदूर पंजाब, मद्रास और दुबई नहीं जायेंगे.
 
झारखंड में ही इन्हें पूरा मौका और संसाधन मिलेगा. आइए हम सब विकास के बढ़ते कदम से कदम मिला कर सरकार के हम सफर बनें. हमें एक ऐसा नेतृत्व मिला है, जो खुद मजदूर था. वे समाज के अंतिम व्यक्ति की पीड़ा को बखूबी समझते हैं. विकास में हमारी सकारात्मक साङोदारी जरूरी है.
(लेखक भाजपा नेता हैं)
 

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