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patna

  • Apr 21 2017 6:30AM

सांसद क्षेत्र विकास फंड के औचित्य पर विचार कर रहा केंद्र

सांसद क्षेत्र विकास फंड के औचित्य पर विचार कर रहा केंद्र

सुरेंद्र किशोर

राजनीतिक िवश्लेषक

क्या

केंद्र सरकार सांसद फंड समाप्त करेगी? विश्वस्त सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार इस बात पर उच्चस्तरीय मंथन चल रहा है कि इसे बंद कर दिया जाये या खर्च  के तरीके को बदला  जाये? क्या इसके बेहतर इस्तेमाल की निगरानी के लिए  कमेटी बनायी  जाये? सरकार को विभिन्न सूत्रों से यह जानकारी मिलती रही है कि इस फंड की कम से कम 60 प्रतिशत राशि का दुरुपयोग हो रहा है. कालाधन पैदा करने का यह भी  जरिया  है.

बड़े पैमाने पर राजनीतिक कार्यकर्ता, अभिकर्ता बन रहे हैं. संघ के कुछ  कई तपे-तपाये कार्यकर्ता भी धनलोलुप बन रहे हैं. वे भी सांसद फंड के ठेकेदार बन गये हैं. पूरी  राजनीति की शुचिता पर भी दाग लग रहा है. इसके बावजूद  फंड के समाप्त होने पर कुछ सांसदों के नाराज होने का खतरा है. इसीलिए केंद्र सरकार संबंधित संसदीय समिति की उस सिफारिश पर भी अब तक कोई फैसला नहीं कर सकी है  जिसके तहत इसको पांच करोड़ से बढ़ाकर 25 करोड़ रुपये कर देने की सिफारिश की गयी है. यह सिफारिश बहुत पहले की गयी. 

काले धन के तमाम स्रोतों पर बारी-बारी से कार्रवाई करने के काम में लगी सरकार काले धन के इस स्रोत को बढ़ाना नहीं चाह रही है. आखिर किया क्या जाये? इसी विचार मंथन के कारण इस पर किसी दो टूक फैसले में देर हो रही है. पर उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड की भारी चुनावी जीत के बाद शायद केंद्र सरकार कुछ सांसदों के नाराज हो जाने की अब परवाह नहीं करे. नीतीश सरकार ने जब सन 2010 में विधायक फंड को समाप्त करने का फैसला किया तो भी कुछ लोग राज्य सरकार को विधायकों का डर दिखा रहे थे.

पर नीतीश कुमार ने उसकी परवाह नहीं की. केंद्र सरकार ने लालबत्ती हटाने का फैसला करके आम लोगों की सराहना पायी है.  यदि सांसद फंड को अंततः समाप्त कर दिया गया तो उसका राजनीति की शुचिता पर सकारात्मक असर पड़ेगा.

सांसद फंड की ताकत : विवादास्पद राजनीतिक परिस्थितियों के बीच 1993 में केंद्र सरकार ने सांसद फंड की शुरुआत की थी. तब से यह अकसर विवादों में रहा है. पर किसी प्रधानमंत्री को यह हिम्मत नहीं हुई कि वे इसे खत्म कर दें. बल्कि जिस नेता ने प्रतिपक्ष में रहने पर इस फंड का कड़ा विरोध किया, उसी नेता ने प्रधानमंत्री बनने के बाद इसे दोगुना कर दिया. 

और तो और नब्बे के दशक में पूर्व प्रधानमंत्री आइके गुजराल के सांसद फंड का भी  बिहार में दुरुपयोग हो चुका है. सांसद फंड के एवज में रिश्वत लेने के आरोप में एक राज्यसभा सदस्य की सदस्यता जा चुकी है. वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता वाली प्रशासनिक सुधर समिति ने इस फंड को समाप्त करने की सिफारिश 2007 में ही कर दी थी. इसके बावजूद ढीली-ढाली मनमोहन सरकार ने 2011 में इसकी राशि 2 करोड़ से बढ़ाकर 5 करोड़ रुपये सालाना कर दी. जब अटल बिहारी वाजपेयी सरकार इस फंड को एक करोड़ रुपये से बढ़ाकर दो करोड़ कर रही थी तो राज्यसभा में प्रतिपक्ष के नेता मनमोहन सिंह ने इस बढ़ोत्तरी का कड़ा विरोध किया था. सीएजी और अदालत भी इस फंड के दुरुपयोग के खिलाफ अपनी राय जाहिर कर चुके हैं. सत्ता संभालने के तत्काल बाद 22 जून, 2014 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि भ्रष्टाचार और धांधली को ध्यान में रखते हुए इसके तहत होने वाले विकास कार्यों की थर्ड पार्टी निगरानी करायी जाएगी. पर लगता है कि उसका भी कोई लाभ नहीं हुआ तो अब इस पर नये ढंग से विचार हो रहा है. 

देखना है कि मोदी सरकार काले धन के इस स्रोत को बंद कर पा रही है या नहीं? 

सीबीआइ से डर क्यों ! : कई साल पहले की बात है. एक पूर्व मुख्यमंत्री सीबीआइ की गिरफ्त से छूट कर आये थे. उन्होंने मीडिया को बताया था कि बहुत मारता है सीबीआई वाला. नेताजी भ्रष्टाचार के आरोप में पकड़े गये थे. चारा घोटाले के एक आरोपी को सीबीआइ ने उल्टा टांग कर कमोड में उसका सिर डाल दिया था. उसके बाद ही उसने अपना अपराध स्वीकारा था. 

पशुपालन महकमे के एक अन्य बड़े अफसर को तो पूरी तरह नंगा करके पीटा गया था. बड़ौदा डायनामाइट केस में गिरफ्तार दिल्ली विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर को तो सीबीआइ ने घंटों कुर्सी से बांध कर प्रताड़ित किया  था. डायनामाइट केस के अधिकतर आरोपियों ने वह सब कुछ बता दिया था जो कुछ सरकारी विरोधी काम उन्होंने आपातकाल में किये थे. सिर्फ जार्ज फर्नांडिस धमकी में नहीं आये थे. इस पृष्ठभूमि में जब ममता बनर्जी का सीबीआइ वालों के बारे में एक बयान आया तो कई लोगों को आश्चर्य हुआ. नारदा शूटिंग केस में फंसे अपने दल के नेताओं से ममता जी ने कहा कि सीबीआइ से डरने की जरूरत नहीं.    

पटना महावीर मंदिर अनुकरणीय : पटना महावीर मंदिर ट्रस्ट का सन 2017-18 का बजट 215 करोड़ रुपये का है. यह ट्रस्ट कई लोकहितकारी संस्थान चलाता  है. वैष्णव देवी को छोड़ दें तो यह उत्तर भारत के किसी अन्य मंदिर ट्रस्ट के बजट से अधिक है. 

यानी काशी विश्वनाथ मंदिर और देवघर मंदिर से भी अधिक. ऐसा नहीं कि काशी और देवघर के मंदिरों की आय पटना के महावीर मंदिर से कम होगी. जानकार लोग बताते हैं कि वहां  समस्या कुशल प्रबंधन की कमी की है. खबर मिलती रहती है कि पटना महावीर मंंदिर ट्रस्ट के सचिव किशोर कुणाल के कुशल निर्देशन में पूरी ईमानदारी बरती जाती है. इसीलिए लोकहितकारी संस्थान भी चल पा रहे हैं. यदि इस देश के बड़े-बड़े मंदिरों की आय का ईमानदारी से इस्तेमाल हो तो न सिर्फ आमलोगों का भला होगा, बल्कि अनेक मंदिरों के प्रबंधकों और पुजारियों की छवि भी बेहतर होगी.  

लाउडस्पीकर के कानफाड़ू शोर से बीमार की नींद खराब : सरकारी सेवा से रिटायर होने के बाद एक बुजुर्ग ने पटना के पास के एक गांव अपना मकान बनाया. सोचा था कि बुढ़ापे में शांति रहेगी. वह बुढ़ापे से संबंधित कुछ मर्ज से भी पीड़ित हैं. उन्हें समय पर भोजन, दवा और भरपूर नींद चाहिए.

पर पास के छोटे मंदिर ने उनकी नींद उड़ा रखी है. मंदिर से आने वाली लाउडस्पीकर की तेज आवाज के कारण उनकी नींद पूरी नहीं हो पाती. चार बजे भोर से ही लाउड स्पीकर से भारी शोर शुरू हो जाता है. नींद उचट जाती है. कई बार मना करने पर भी मंदिर के पुजारी पर कोई असर नहीं पड़ा. ध्वनि प्रदूषण @रेगुलेशन एंड कंट्रोल@ रूल्स 2000 के नियम -5 के अनुसार- रात दस बजे के बाद और सुबह छह बजे से पहले लाउड स्पीकर  बजाने पर रोक है. 

पटना हाइकोर्ट ने भी इस नियम को लागू करने के लिए बिहार सरकार से कह रखा है. पर राज्य सरकार और स्थानीय शासन पर उसका कोई असर नहीं है. राज्य सरकार न तो बीमार और बुजुर्गों पर ध्यान दे रही है और न छात्रों की पढ़ाई-लिखाई पर. ऐसे स्थलों पर लाउडस्पीकरों का असीमित और गैर जरूरी इस्तेमाल के लिए आमतौर पर बिजली की चोरी होती है. यदि बिजली महकमा ओवरहेड केबुल लगाने के काम में तेजी लाता तो आम लोगों को बड़ी राहत मिलती.

और अंत में

वरिष्ठ कांग्रेस नेता अहमद पटेल ने कहा है कि अजान जरूरी है. पर लाउडस्पीकर जरूरी नहीं है. क्या इसी तरह अन्य संबंधित नेतागण सार्वजनिक रूप से यह कहेंगे कि आरती जरूरी है, पर लाउडस्पीकर नहीं? क्या कोई यह भी कहेगा कि चोरी की बिजली से कोई धार्मिक काम करना पाप है?

 

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