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  • Apr 21 2017 8:38AM

भारत से बाहर दुनिया के इन देशों में नहीं है VIP कल्चर

भारत से बाहर दुनिया के इन देशों में नहीं है VIP कल्चर

केंद्रीय कैबिनेट में लालबत्ती पर बैन के फैसले ने वीआईपी कल्चर को लेकर नये सिरे से बहस छेड़ दी है. आम भारतीय जनमानस में वीआईपी की जो छवि है, उसमें लालबत्ती सबसे पहले आती है. लालबत्ती का एक प्रतीकात्मक महत्व है, जो पुराने जमाने के सामंतवाद से मेल खाती है. लालबत्ती के अलावा कारों का काफिला, सायरन का उपयोग कई ऐसी चाजें है, जो वीआईपी कल्चर के प्रतीक है. भारत में वीआईपी कल्चर की जड़े काफी गहरी है. देश आजाद होने के बाद उसकी जड़ें और भी गहरी होते गयी लेकिन दुनिया के कई अन्य देश हैं. जहां यह खत्म होने के कगार पर है.

 
स्वीडन और नार्वे जैसे देशों में वीआईपी कल्चर लगभग नहीं के बराबर है. यहां प्रधानमंत्री आम ट्रेनों में सफर करते हैं. बिना काफिला के एक जगह से दूसरे जगह जाते हैं. कॉफी शॉप के दुकानों में आम शख्स के साथ बैठकर बातें करते हैं. बेशक दुनिया में बढ़ते आतंकी खतरों को देखते हुए लोग सुरक्षा कर्मी अपने साथ रखते हैं. विशिष्टता का बोध कराने वाला वीआईपी कल्चर की गैरमौजूदगी सिर्फ सरकारी महकमों और प्रधानमंत्री तक सीमित नहीं है. बल्कि निजी कंपनियों में भी सीइओ और उसी कंपनी में काम करने वाले मजदूर के बीच का फासला बेहद कम होता है.
 
नार्वे के किंग हेराल्ड -V अपनी गाड़ी खुद चलाते हैं. ध्यान देने वाली बात यह है कि मानव विकास सूचकांक द्वारा जारी रिपोर्ट में नार्वे और स्वीडन  शीर्ष पर रहने वाला देशों में शामिल है. यहां आर्थिक असमानता न के बराबर है. नार्वे की तरह स्वीडन में भी वीआईपी कल्चर नहीं है. एक कंपनी का सीईओ, क्लीनर से लेकर राजा किसी के हाव -भाव में विशिष्टता का बोध नहीं होता है.
 
स्वीडन के पूर्व प्रधानमंत्री ओलोफ पामे को 28 फरवरी 1986 की आधी रात को उस वक्त हत्या कर दी गयी थी, जब वो सिनेमा देखने के बाद पैदल घर लौट रहे थे. हालांकि इस घटना की जांच अभी भी चल रही है लेकिन यह दुर्लभ देशों में से एक है जहां प्रधानमंत्री पैदल चला करते हैं. आठ साल पहले न्यजीलैंड के प्रधानमंत्री हेलन क्लार्क के काफिले को तेज गति से वाहन चलाने के आरोप में पकड़ लिया गया था. बाद में उन्हें कानून प्रक्रिया से गुजरना पड़ा. दुनिया के परिपक्व लोकतंत्र में राजनेताओं का व्यवहार आम इंसान की तरह ही होता है. 
 
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