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  • May 19 2017 6:05AM

आजादी पर आघात है आधार

रीतिका खेड़ा

आइआइटी, दिल्ली

reetika@riseup.net

पैन के साथ आधार की अनिवार्य सहलग्नता (लिंकेज) एक लोकतंत्र में निजता की अहमियत से संबद्ध है. सुप्रीम कोर्ट के समक्ष याचिकाकर्ताओं का पक्ष रखनेवाले अधिवक्ताओं ने आधार परियोजना को लेकर कई प्रमुख समस्याएं उठायीं. पहली- वरीय अधिवक्ता श्याम दीवान एवं अरविंद दातार ने कोर्ट को बताया कि आधार अधिनियम स्वयं ही आधार को अनिवार्य बनाने की अनुमति नहीं देता. इस अधिनियम की धारा-3 इसे नागरिकों का एक अधिकार करार देती है कि वे आधार हासिल तो कर सकते हैं, पर यह उनके लिए कर्तव्य नहीं है. ऐसे में आयकर अधिनियम में आधार को अनिवार्य करने के प्रावधान कैसे किये जा सकते हैं? दातार ने कहा, पैन के साथ आधार की अनिवार्य लिंकेज संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करती है और आधार अधिनियम एवं आयकर अधिनियम एक-दूसरे के विरोधी हो जाते हैं. 

दूसरी- कार खरीदने, कोई संपत्ति बेचने या बचत खाता खोलने जैसी गतिविधियां भी बायोमेट्रिक पर निर्भर हो जायेंगी. दातार का सवाल था कि रोजाना के कामकाज के लिए उंगलियों के निशान की मांग कोई कैसे कर सकता है. यह अनुच्छेद 19(1)(जी) का उल्लंघन है. 

तीसरी- दीवान के याचिकाकर्ताओं- वोमबटकेरे (सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी) और बेजवाड़ा विल्सन (मैग्सेसे पुरस्कृत) जो टैक्स तो देना चाहते हैं, पर आधार नहीं लेना चाहते. देश में उनके जैसे अन्य लोग भी हैं. आधार की पैन से लिंकेज अनिवार्य करनेवाला संशोधन उन दोनों के बीच भेदभाव रखता है, जिनके पास आधार है और जो आधार नहीं लेना चाहते. दोनों ही तरह के लोग टैक्स देना चाहते हैं, मगर जो आधार नहीं लेना चाहते, वे दंडनीय नतीजों के भागी होंगे. यह प्रावधान समानता के अधिकार की गारंटी देनेवाले संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है.

चौथी- दीवान ने कहा, ‘मेरी उंगलियों के निशान और मेरी आंखों की पुतलियां मेरी हैं और मेरे नियंत्रणाधीन हैं. भारत का संविधान सरकार को यह अनुमति नहीं देता कि वह मुझसे किसी भी चीज के बदले में यह कह सके कि आप हमें अपनी उंगलियों के निशान दें.’ उन्होंने ऐसे नियंत्रणों को गुलामी से संबद्ध बताया. 

एक व्यक्ति के शरीर का उपयोग स्वयं उसके ही उद्देश्यों की पूर्ति के लिए हो सकता है. तब न्यायपीठ ने पूछा कि क्या पासपोर्ट के मामले भी यही दलील लागू हो सकती है. दीवान ने कहा कि पासपोर्ट या अपराधियों की पहचान के लिए उंगलियों के निशान लेना एक भिन्न मामला है, क्योंकि ऐसा एक सीमित परिस्थिति में होता है. जबकि, बायोमेट्रिक सूचनाओं को बड़े पैमाने पर संग्रहीत कर उन्हें एक केंद्रीय भंडारण व्यवस्था में नहीं रखा जा सकता.

पांचवीं- दीवान ने कहा कि यदि निजता को छोड़ भी दिया जाये, तो निगरानी करने, व्यक्तिगत विवरण बनाने और आधार को अनेक डाटाबेस से जोड़ने को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. आधार नामांकन की प्रक्रिया निजी एजेंटों द्वारा संपन्न की जाती है, जो बायोमेट्रिक सूचनाएं एकत्र कर उनका भंडारण करते हैं. आधार अधिनियम 2016 पारित होने के पहले, पुराने आधार नामांकन फॉर्म को पढ़ते हुए उन्होंने पीठ को बताया कि इसे भरते हुए नागरिकों को विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआइडीएआइ) को अपनी यह सहमति देनी पड़ती थी कि वह उनकी सूचनाएं किसी भी तीसरे पक्ष से साझा कर सकता था. दरअसल, आधार एक ‘इलेक्ट्रॉनिक डोरी’ का काम करते हुए किसी की लगातार निगरानी करना संभव कर देता है.  

छठवीं- आधार परियोजना घपलों से भरी रही है. 12 सरकारी वेबसाइटों द्वारा आधार से संबद्ध सूचनाओं का भारी रिसाव हुआ है. इसमें झारखंड का सामाजिक सुरक्षा निदेशालय भी शामिल है, जिसने दस लाख से भी अधिक पेंशन प्राप्तकर्ताओं की आधार संख्याएं तथा बैंक खाता संख्याएं प्रदर्शित कर दीं. 

इसके बावजूद, सरकार के बाध्यता मूलक तिकड़मों- मसलन राशन, मिडडे मील को आधार से जोड़ने पर ही मुहैया किये जाने के नियमों- द्वारा लोगों से बलपूर्वक आधार नामांकन कराया जा रहा है. सातवीं- आधार नामांकन फॉर्म में लिखा है कि यह सहमतिमूलक तथा ऐच्छिक है. जबकि शर्मनाक तथ्य यह है कि बच्चों, यहां तक कि नवजातों को भी स्कूलों में प्रवेश हेतु आधार में नामांकन के लिए बाध्य किया जा रहा है. दीवान की दलील थी कि सहमति को स्वतंत्र तथा जानकारीपूर्ण होना ही चाहिए. 

आठवीं- आधार परियोजना राज्य एवं व्यक्ति के बीच के संबंध बदल डालती है और यह ‘सीमित सरकार’ की उस अवधारणा के विरुद्ध है, जिसके द्वारा हमारे जीवन में सरकार का दखल कहां तक हो सकता है, यह तय किया जाता है. यह नागरिक स्वतंत्रता का मसला है. दीवान ने इस पर जोर दिया कि भारत के लोगों ने संविधान को ‘आत्मार्पित’ किया है. भारत का संविधान कोई गुलामी का अभिलेख नहीं है. 

दीवान ने कोर्ट को यह याद दिलाया कि इस मामले को जब अक्तूबर 2015 में ‘अत्यावश्यक रूप से’ (अर्जेंटली) एक संविधान पीठ के सुपुर्द किया गया था, तब से तीन प्रधान न्यायाधीश इसकी सुनवाई के लिए पीठ का गठन करने में असमर्थ रहे कि क्या निजता एक मौलिक अधिकार है. संप्रति, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अपना निर्णय सुरक्षित कर लिया है. 

(अनुवाद: विजय नंदन) 

 

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