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  • May 12 2017 12:58AM

कार बनाम धिक्कार

सुरेश कांत
वरिष्ठ व्यंग्यकार
कुछ होते हैं कार-सेवक. यानी ऐसे स्वयंसेवी, जो लोगों की मदद कर उनका जीवन सुविधाजनक और आसान बनाने की कोशिश करते हैं. कार-सेवक कहलाते हुए भी वे बिना किसी कार, जीप आदि की अभिलाषा के यह काम करते हैं. वह इसलिए कि ‘कार-सेवा’ में जो ‘कार’ है, वह अंगरेजी की ‘कार’ नहीं, बल्कि फारसी का ‘कार’ है, जिसका अर्थ है काम, काज, कार्य. 
 
‘कारोबार’ में यही ‘कार’ है- कार-ओ-बार. ‘बार’ यानी बोझ, भार. ‘कारोबार’ का अर्थ इस तरह ‘कार्यभार’ के सिवा कुछ नहीं. ‘काररवाई’ भी इसी ‘कार’ की ‘रवाई’ यानी अनवरतता है, जो अब घिस कर ‘कार्रवाई’ रह गयी है. 
 
‘कारनामा’ में भी यही ‘कार’ है, जिसका अर्थ पहले तो ‘प्रशंसनीय काम’ होता था, बाद में कुछ लोगों के अप्रशंसनीय कामों की बदौलत ‘करतूत’ भी होने लगा. और ‘सरकार’ में तो है ही, जिसका अर्थ यों तो ‘शासन’ होता है, पर जो कुशासन की पर्याय होते-होते दुशासन की प्रतीक होती जाती है. यह उसी की ‘कारस्तानी’ है, जो आज इतने लोग 'बेकार' फिरते हैं.
 
इसके विपरीत खुदा या भगवान बड़ा ‘कारसाज’ यानी काम बनाने, संवारनेवाला होता है, जिसे यों भी कहा जा सकता है कि जो भी काम बनाने-संवारनेवाला हो, वह खुदा होता है. कार-सेवक अपनी कार-सेवा द्वारा उस खुदा का ही काम करते हैं.
 
तो कुछ तो होते हैं कार-सेवक, और कुछ होते हैं धिक्कार-सेवक. धिक्कार-सेवक भी होते कार-सेवक ही हैं, पर थोड़े ऊंचे दर्जे के, क्योंकि वे अपनी कार-सेवा में ‘धिक्’ का लीवर लगा उसे काफी ऊंचा उठा देते हैं. और खुद भी काफी ऊंचे उठ जाते हैं, भले ही केवल अपनी ही नजर में उठें.
धिक्कार-सेवक कई रूपों में लोगों को अपनी धिक्कार-सेवा प्रदान करते हैं. बिना किसी भेदभाव के वे कार-सेवक को भी धिक्कारते हैं कि वह कार-सेवा द्वारा किसी की मदद क्यों कर रहा है, और उतनी ही शिद्दत से कार-सेवित को भी धिक्कार देते हैं कि वह किसी की मदद लेने जैसा घटिया काम क्यों कर रहा है और इसके बजाय किसी नदी-नाले में जाकर डूब क्यों नहीं मरता? नदी-नाला दूर हो, तो वे कृपा कर उन्हें वहीं बैठे-बैठे चुल्लूभर पानी में डूब मरने का आसान विकल्प भी देते हैं.
 
धिक्कार-सेवक इतने ज्यादा विनम्र होते हैं कि कार-सेवकों से कहीं ज्यादा उत्तम सेवा प्रदान करने के बावजूद सार्वजनिक रूप से कार-सेवक ही कहलाते रहना चाहते हैं. कार-सेवा के नाम पर आप उनसे किसी भी तरह की धिक्कार-सेवा करवा सकते हैं. और अगर वह कार-सेवा धर्म के नाम पर हो, तो फिर तो कहना ही क्या!
 

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