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aalekh

  • Dec 14 2014 1:38AM

संघ का भ्रम-द्वंद्व और मोदी की परेशानी

संघ का भ्रम-द्वंद्व और मोदी की परेशानी

।। एन के सिंह।।

 वरिष्ठ पत्रकार
 
सीना 56 इंच का, फिर भी संसद के सदनों में घूम-घूम कर माफी की गुहार. आखिर क्यों? डेढ़ साल पहले जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय राजनीतिक क्षितिज पर आये थे, आम मतदाताओं में एक उम्मीद जगी थी कि सड़ी-गली राजनीति का पुराना दौर खत्म होगा और राजनीतिक संवाद में ‘पैराडाइम शिफ्ट’ होगा. 
 
लेकिन, ऐसा क्यों हो रहा है कि संसद के मौजूदा शीत सत्र में, इतिहास में पहली बार दस दिन के अंदर ही प्रधानमंत्री के अलावा सत्तारूढ़ पार्टी के दो सदस्यों (जिनमें एक मंत्री हैं) और विपक्ष के एक सदस्य को सदन में अपने वक्तव्य  के लिए माफी मांगनी पड़ी? क्यों संविधान के अभिरक्षण और परिरक्षण की शपथ लेनेवाला राज्यपाल मंदिर बनाने की बात कह कर सर्वोच्च न्यायलय में चल रहे विवाद को प्रभावित करता है, तो दूसरी तरफ ‘घर-वापसी’ का ‘रेट’ खोल दिया गया है? बड़ी उम्मीद थी कम-से-कम देश के 87 करोड़ वोटरों को, कि देश का विकास होगा, भ्रष्टाचार कम होगा, नौकरी का माहौल पैदा होगा, ट्रेनें समय पर चलेंगी, सदन में बहस होगी तो विकास की गति तेज करने को लेकर. लेकिन, ‘आगरा में धर्म परिवर्तन’, ‘रामजादे बनाम हरामजादे’ ‘ताजमहल या तेजोमहालय (शिवमंदिर)’ से ऊपर न तो पार्टी बढ़ पा रही है, न ही नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की सरकार. पिछले 190 दिनों के शासनकाल में हर तीसरे दिन प्रतीक की राजनीति का घिनौना चेहरा ‘सांप्रदायिक वितंडावाद’ के रूप में देखने को मिल रहा है.  
यहां दो अहम प्रश्न खड़े होते हैं. पहला, आखिर मोदी की मजबूरी क्या है? और दूसरा, क्यों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके अनुषांगिक संगठन हिंदुत्व की गरिमा को इतना नीचे धकेल रहे हैं? संघ एक विचारवान, वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध, अनुशासित और बेहद व्यापक संगठन है. तो क्या यह अपने लोगों को दूसरे ‘घर’ में जाने से रोक नहीं पा रहा है या इतनी जल्दी में है कि ‘युद्ध में सब कुछ जायज है’ के भाव में आ गया है और नतीजतन मोदी की विश्वसनीयता को ही जाने-अनजाने में आघात पहुंचा रहा है? क्या यह उचित न होता कि अगले पांच वर्षो तक मोदी खुद को सिर्फ देश के विकास में ही संलग्न रखते और पूरे समाज को यह संदेश देते कि ‘यह होता है सुशासन’ और इसके जरिये सामाजिक समरसता बढ़ा कर वे पारस्परिक दुराव से ग्रस्त कई खानों में बंटे हिंदू समाज को ही नहीं, अल्पसंख्यकों को भी अपने साथ करते? 
धर्म-परिवर्तन का ही मुद्दा लें. इसमें संघ का भ्रम-द्वंद्व साफ झलकता है. एक तरफ संघ तथाकथित धर्म-निरपेक्षता के जवाब में बताता रहा है कि दरअसल धर्म और पंथ अलग-अलग हैं. पूजा-पद्धति अलग हो सकती है, पर चूंकि हिंदू या सनातन धर्म जीवन पद्धति है, लिहाजा मुसलमान या ईसाई चाहे कोई पूजा-पद्धति रखें, वे भी सनातन धर्म के वृहत छाते के ही अंदर हैं. सरसंघचालक मोहन भागवत ने हाल ही में मुसलमानों को भी हिंदू मान कर इस संघीय अवधारणा पर मुहर लगायी है. 
 
अब अगर मुसलमान भी हिंदू हैं, तो फिर किसकी घर वापसी? वह तो घर ही में हैं न? केवल उसने अपनी पूजा-पद्धति ही तो अलग रखी है. फिर विवाद किस बात का. संघ के सधे और रणनीतिकुशल विचारकों का इतना भौंडा प्रदर्शन क्यों, कि धर्म-परिवर्तन के लिए चिट्ठी लिखी जाती है यह कहते हुए कि मुसलमान को हिंदू बनाने में पांच लाख रुपये देने हैं और ईसाई को हिंदू बनाने में दो लाख. और यह चिट्ठी भी मीडिया को लीक हो जाती है. संघ के पास अपनी इज्जत छिपाने के लिए एक चार-इंच का कपड़ा भी नहीं रह जाता. 
फिर किस घर में वापसी करोगे? जो लोग छोड़ कर गये, उनमें अधिकतर तो घर में रह कर भी सदियों तक अछूत ही बने रहे थे और तभी तो घर बदला था. क्या संघ ने अपने घर की वे कुरीतियां खत्म कर दी हैं? कितने आंदोलन संघ द्वारा किये गये हैं हिंदू धर्म में निचले तबके को समान अधिकार और सम्मान दिलाने के लिए? लगभग 88 साल के अपने जीवन में संघ के शीर्ष नेतृत्व ने (गुरुजी के काल में) न तो स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया (हालांकि स्वयंसेवक छटपटाते रहे), न ही दिल से समाज सुधार की दिशा में कोई सायास कदम उठाये.
 
एकचालाकानुवर्ती (एक नेता द्वारा चालित)  ब्राह्मणवादी व्यवस्था से स्वयं जकड़े संघ ने रज्जू भैया के कार्यकाल में समरसता की कोशिश की भी, तो बेमने ढंग से. शीर्ष नेताओं ने बड़े आडंबर और लाव-लश्कर के साथ बनारस (वाराणसी) के डोम राजा के घर खाना तो खाया, लेकिन अन्य जगहों पर दलितों के यहां पानी न पीकर कार में रखी मिनरल वाटर की बोतल से पानी पीते रहे. 
 
समरसता का आंदोलन दृढ-इच्छाशक्ति के अभाव में असफल रहा. हिंदू समाज की अन्य बुराइयां, जैसे बाल विवाह, विधवा प्रताड़ना, दहेज परंपरा पर सरकारी कानून के अलावा संघ ने अपनी तरफ से शायद ही कुछ सार्थक प्रयास किये हों.  ऐसा नहीं है कि संघ के पास अच्छे, उदारवादी विचारकों की फौज नहीं है, पर लगता है कि उन पर वह वर्ग भारी पड़ रहा है जो मोदी की सत्ता की आंच में अपने को सेंकने में ज्यादा दिलचस्पी ले रहा है. वरना 88 साल के इस संगठन को क्या यह समझ में नहीं आ पाया कि भ्रष्टाचार एक सामाजिक व्याधि है और इसके खिलाफ जनमत बनाना भी इसका ही काम था, न कि किसी अन्ना हजारे का. न तो संघ अपना मूल कार्य (हिंदू धर्म यानी अपने घर को बेहतर करना, ताकि घर के सभी सदस्यों को समान दर्जा मिले) कर सका और न ही भ्रष्टाचार जैसे सामाजिक व्याधि के खिलाफ चरित्र निर्माण का बीड़ा उठा पाया. 
नौ दशक के जीवन काल में संघ एक शाश्वत भाव लेकर चला और वह था ‘उनका और हमारा’ (अस वर्सेज देम). आज जब सत्ता साथ में है तो संघ समर्थित एक वर्ग लंपटवादिता की राह से या उच्छृंखलता के जरिये ‘घर-वापसी’ अभियान चला रहा है. एक भाजपा सांसद का दावा है कि अलीगढ़ में 25 दिसंबर को हजारों ईसाई ‘घर-वापसी’ करेंगे. क्या यह संघ से अपेक्षित नहीं था कि पहले वह अपना घर रहने लायक बना ले. घर वापसी की ललक तो सब में स्वाभाविक रूप से रहती है. इसके लिए कोई रेट तय करने की जरूरत नहीं होती.
एक और पक्ष लें. मोदी इतने कमजोर रहते तो अपने मन का पार्टी अध्यक्ष न बना पाते, न ही पार्टी के दिग्गज नेताओं को हाशिये पर ला सकते. लिहाजा अगर उत्तर प्रदेश के उपचुनाव में कोई गेरुआधारी आदित्यनाथ चुनाव का मुखिया बनाया जाता है तो मोदी के ‘विकासकर्ता’ के स्वरूप पर शक होने लगता है. यह शक तब और भी पुख्ता हो जाता है, जब एक कीर्तन करनेवाली फस्र्ट-टाइमर सांसद साध्वी निरंजन ज्योति इतने विशाल भारत की मंत्री बनायी जाती है और अगले सत्र में ही वह सदन की गरिमा रसातल में पहुंचाते हुए कहती है कि ‘या तो रामजादों को वोट दें या हरामजादों को’. शायद कीर्तन सुनने वाले कुछ लोग इस पर ताली बजाते हों, पर संसद शर्मसार हो गयी है. 
विडंबना यह कि नरेंद्र मोदी ने उस मंत्री के कहे पर दोनों सदनों में माफी तो मांगी, लेकिन फिर वही प्रतीक और अलगाव की राजनीति जारी है! शाम तक पार्टी के प्रवक्ता ने कहा, ‘चूंकि साध्वी दलित वर्ग की हैं (हालांकि वह अति-पिछड़े वर्ग की हैं) इसलिए विपक्ष उनको लक्षित कर रहा है. प्रधानमंत्री ने अगले दिन ही इस साध्वी को दिल्ली में चुनाव प्रचार करने यानी उसे अपनी भाषा में बोलने की इजाजत दे दी. 
मोदी और संघ को चुनना पड़ेगा अपना रास्ता. अगर उनका यही रास्ता है, तो यह अनैतिक, गैर-प्रजातांत्रिक, घृणा फैलानेवाला है, जिससे जनता जल्द ही निराश हो जायेगी, क्योंकि मोदी पर उसने अपनी सारी बोली लगा दी थी. वैसे भी ताजा सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, इस साल कृषि उत्पादन पांच साल में सबसे कम होगा, क्योंकि रबी का रकबा काफी कम हुआ है. इन सात महीनों के शासनकाल में मोदी सरकार किसानों को प्रोत्साहित कर सकती थी, इस रकबे को बढ़ाने के लिए जो नहीं हुआ. ऐसे में तो आम जनता के लिए अच्छे दिन आने से रहे.
 
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